संजय कुमार सराठे
Sunday, June 24, 2007
हाइकु कविताएँ
नीर कणों ने
बिखेर दिया जादू
भू-मंच पर ।
टिपटिपाती
बूँदें बरसात की
नया संगीत ।
धरा श्रृंगार
स्वीकार कर लिया
नीर कणों ने ।
धरा ने ओढ़ी
चादर सुनहली
नई उषा की ।
देश की शान
विश्व में पहचान
भाषा हिन्दी की ।
सूखे दरख्त
समाज के बंधन
सींचेगा कौन ।
आज के नेता
देश के पौधे पर
अमरबेल ।
प्रजातंत्र में
मानव अभिमत
देश का सत ।
महिला रक्षा
नई ढपली हेतु
पुराना राग ।
शिक्षा का रथ
सारथी के अभाव
बढेग़ा कैसे।
रात-दिन की
मिलन मनुहार
संध्या के द्वार ।
आज की शिक्षा
बिना नींव का एक
ऊंचा भवन ।
अभिनंदन
धरती के रूप का
किया वर्षा ने।
प्रकृति नारी
हरित श्रृंगार में
मोहक लगे ।
समय चक्र
परिवर्तन कर
नजारा देखे।
हाय मानव
पहचान खो गई
इस युग में ।
फूले कास ने
हथेली फैलाकर
समेटी खुशी ।
ये कैसे पर
दिल में हलचल
तुम्हारे बिना ।
ढलती रात
दरिया से कहती
विदा ले हम ।
समय चक्र
बदलती दुनियां
मानव कहां ?
बिना अधूरी
सोलह श्रृंगार के
चॉंदनी रात ।
बिखेर दिया जादू
भू-मंच पर ।
टिपटिपाती
बूँदें बरसात की
नया संगीत ।
धरा श्रृंगार
स्वीकार कर लिया
नीर कणों ने ।
धरा ने ओढ़ी
चादर सुनहली
नई उषा की ।
देश की शान
विश्व में पहचान
भाषा हिन्दी की ।
सूखे दरख्त
समाज के बंधन
सींचेगा कौन ।
आज के नेता
देश के पौधे पर
अमरबेल ।
प्रजातंत्र में
मानव अभिमत
देश का सत ।
महिला रक्षा
नई ढपली हेतु
पुराना राग ।
शिक्षा का रथ
सारथी के अभाव
बढेग़ा कैसे।
रात-दिन की
मिलन मनुहार
संध्या के द्वार ।
आज की शिक्षा
बिना नींव का एक
ऊंचा भवन ।
अभिनंदन
धरती के रूप का
किया वर्षा ने।
प्रकृति नारी
हरित श्रृंगार में
मोहक लगे ।
समय चक्र
परिवर्तन कर
नजारा देखे।
हाय मानव
पहचान खो गई
इस युग में ।
फूले कास ने
हथेली फैलाकर
समेटी खुशी ।
ये कैसे पर
दिल में हलचल
तुम्हारे बिना ।
ढलती रात
दरिया से कहती
विदा ले हम ।
समय चक्र
बदलती दुनियां
मानव कहां ?
बिना अधूरी
सोलह श्रृंगार के
चॉंदनी रात ।
-संजय कुमार सराठे
Friday, March 10, 2006
आओ मनाएँ होली !
बासंती परिवेश मे आओ मनाएँ होली
बासंती परिवेश मे आओ मनाएँ होली !
सूखे पलाश ने गुपचुप-गुपचुप
फैला दी रंगों की झोली,
बासंती परिवेश मे आओ मनाएँ होली !
इतराते आमों पर सौंधी खुशबू
बौरों की लगी बिखरने चोली,
बासंती परिवेश मे आओ मनाएँ होली !
पप्पू-मुन्नी रीना-टीना मनाए खुशियाँ
पिचकारी भर-भर रगों की गोली,
बासंती परिवेश मे आओ मनाएँ होली !
क्ल-कल झरना बोला-कहाँ चली
ओ पवन मतवाली लेकर अपनी टोली,
बासंती परिवेश मे आओ मनाएँ होली !
भेदभाव को छोड़ हम मिल जुलकर
तिलक करें अटूट रिश्तों की रोली,
बासंती परिवेश में आओ मनाएँ होली !
बासंती परिवेश मे आओ मनाएँ होली !
सूखे पलाश ने गुपचुप-गुपचुप
फैला दी रंगों की झोली,
बासंती परिवेश मे आओ मनाएँ होली !
इतराते आमों पर सौंधी खुशबू
बौरों की लगी बिखरने चोली,
बासंती परिवेश मे आओ मनाएँ होली !
पप्पू-मुन्नी रीना-टीना मनाए खुशियाँ
पिचकारी भर-भर रगों की गोली,
बासंती परिवेश मे आओ मनाएँ होली !
क्ल-कल झरना बोला-कहाँ चली
ओ पवन मतवाली लेकर अपनी टोली,
बासंती परिवेश मे आओ मनाएँ होली !
भेदभाव को छोड़ हम मिल जुलकर
तिलक करें अटूट रिश्तों की रोली,
बासंती परिवेश में आओ मनाएँ होली !
-संजय कुमार सराठे
तुम याद आना
तुम याद आना
यादों के समंदर में
आँसू सी लहर बन
मन की कोमल बगिया के
तरु को सिंचित कर
प्रीति के सुमन खिला जाना
तुम याद आना तुम याद आना।।
घोर अँधेरी रातों में
जुगुनू–सी चमक बन
नीरवता के वितान में
पायल की झनकार से
मधुमय अहसास दिला जाना
तुम याद आना
तुम याद आना।।
***
-संजय कुमार सराठे

